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वर्ल्ड ऑफ वर्ड्स बुक क्लब में हुई “गांधी और सरला देवी चौधरानी” पुस्तक पर विचारोत्तेजक चर्चा

वर्ल्ड ऑफ वर्ड्स बुक क्लब की साहित्यिक श्रृंखला के अंतर्गत इस बार चर्चित लेखिका अलका सरावगी द्वारा लिखित तथा वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “गांधी और सरला देवी चौधरानी” पर एक गंभीर एवं भावपूर्ण चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में पुस्तक के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, स्त्री चेतना, वैचारिक संवाद और गांधी-सरला संबंधों के अनेक अनछुए पहलुओं पर विस्तार से विमर्श हुआ। अंशु हर्ष, कमला पोद्दार और यश कालरा मुख्य वक्ता रहे टैगोर परिवार की सांस्कृतिक विरासत में पली-बढ़ी सरला देवी चौधरानी केवल एक साहित्यिक और बौद्धिक व्यक्तित्व ही नहीं थीं, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना, स्त्री अधिकारों और सामाजिक परिवर्तन की सशक्त आवाज भी थीं। सत्र में यह उल्लेख किया गया कि सरला देवी ने अपने मामा रविन्द्रनाथ टैगोर के साथ वंदे मातरम् की धुन तैयार की थी, किंतु इतिहास में उनके योगदान को वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी वे अधिकारिणी थीं।
कार्यक्रम में पुस्तक के उन प्रसंगों पर विशेष चर्चा हुई जिनमें जलियांवाला बाग कांड के बाद गांधी जी का लाहौर प्रवास, सरला देवी के साथ उनकी पहली गहन मुलाकात, दोनों के बीच वैचारिक निकटता तथा पत्राचार के माध्यम से विकसित हुई आत्मीयता को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है। वक्ताओं ने कहा कि पुस्तक केवल दो व्यक्तित्वों की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के सामाजिक, राजनीतिक और भावनात्मक द्वंद्वों का दस्तावेज भी है।चर्चा में यह भी सामने आया कि सरला देवी ने भारत स्त्री महामंडल की स्थापना कर महिलाओं को सामाजिक बंधनों और पुरुषवादी सोच से मुक्त करने का प्रयास किया। उनके व्यक्तित्व की तेजस्विता, ओजस्वी वाणी और राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण ने गांधी जी को भी गहराई से प्रभावित किया था। इस किताब में सरला देवी और गांधी जी के बीच बढ़ती वैचारिक निकटता तथा उसके पारिवारिक प्रभावों को संवेदनशील ढंग से उकेरा गया है। साथ ही गांधी जी द्वारा सरला देवी को लिखे गए पत्रों का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह संबंध केवल राजनीतिक नहीं बल्कि गहरे विश्वास, संवाद और आत्मिक साझेदारी का भी प्रतीक था। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक इतिहास के उन पन्नों को सामने लाती है जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। साथ ही यह पुस्तक पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी भी आंदोलन और परिवर्तन के पीछे स्त्रियों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। कार्यक्रम का वातावरण साहित्यिक संवेदनाओं, वैचारिक संवाद और ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध रहा। उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने पुस्तक को एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति बताते हुए इसकी सराहना की।



