
प्रस्तावना : गुरु जीवन को सही दिशा देने वाले होते हैं। जैसे श्री दत्तगुरु ने 24 गुणगुरु किए, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक परिस्थिति में गुण देखने की दृष्टि गुरु प्रदान करते हैं। किंतु प्रायः हम अपने तथा दूसरों के गुणों के स्थान पर केवल स्वभावदोषों और कमियों पर ही ध्यान देते हैं। परिणामस्वरूप हम जीवन के अनेक आनंदमय क्षणों का अनुभव करने से वंचित रह जाते हैं।वास्तव में आनंदमय जीवन जीने के लिए श्री दत्तगुरु की भाँति प्रत्येक व्यक्ति में गुण देखने की वृत्ति आवश्यक है। गुरुकृपायोग के अनुसार व्यक्ति के स्वभावदोष और अहं किस प्रकार दूर होते हैं तथा वह आनंदमय जीवन की ओर कैसे अग्रसर होता है, इस विषय में सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख में जानकारी दी गई है।
गुरुकृपा का महत्त्व : श्री गुरुचरित्र (13:30) में कहा गया है— “गंगा से पाप, चंद्रमा से ताप और कल्पवृक्ष से दैन्य दूर होता है; परंतु श्रीगुरु के दर्शन मात्र से पाप, ताप और दैन्य—इन तीनों का नाश हो जाता है।”
गुरु जीव को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। गुरुकृपा से साधक के जीवन में अंतर्मुखता, सात्त्विकता तथा आत्मिक आनंद का उदय होता है। ईश्वर में न तो स्वभावदोष हैं और न ही अहं; इसलिए ईश्वर से एकरूप होने के लिए अपने भीतर के स्वभावदोषों और अहं का निर्मूलन करना आवश्यक है। साधना से मन शुद्ध होता है, सूक्ष्म दृष्टि जागृत होती है तथा जीवन को देखने का दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। यह सब गुरुकृपा से ही संभव होता है।
अष्टांग साधना : नामजप, सत्संग, सत्सेवा, सत् के लिए त्याग, निरपेक्ष प्रेम, स्वभावदोष-निर्मूलन, अहं-निर्मूलन तथा भाववृद्धि—ये गुरुकृपायोग की अष्टांग साधना के प्रमुख अंग हैं। इनके माध्यम से साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है। अष्टांग साधना के अभ्यास से साधक में यह भाव दृढ़ होता है कि “सब कुछ ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही हो।”
आज ही साधना प्रारंभ करें : युवाओं को वृद्धावस्था की प्रतीक्षा किए बिना युवावस्था में ही साधना प्रारंभ कर देनी चाहिए; क्योंकि मनुष्य जन्म का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति है। वृद्धावस्था में अनेक प्रकार की शारीरिक व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिससे मन उन्हीं में अधिक उलझा रहता है। उस समय उन व्याधियों को सहन करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए भी साधना आवश्यक होती है। गुरुकृपा के बल पर साधक आनंदमय जीवन जीने में समर्थ बनता है।
गुरुतत्त्व के चरणों में प्रार्थना : इस प्रकार गुरुकृपायोग की अष्टांग साधना साधक को स्वभावदोष और अहं के निर्मूलन के माध्यम से ईश्वरप्राप्ति की दिशा में अग्रसर करती है तथा कलियुग के अस्थिर जीवन में चिरस्थायी आनंद प्रदान करती है। इसलिए गुरुकृपायोग केवल साधना का मार्ग ही नहीं, बल्कि आनंदमय एवं आदर्श जीवन जीने का सर्वोत्तम मार्ग है।
अपने भीतर के स्वभावदोष और अहं को दूर करके जीवन के प्रत्येक क्षण का वास्तविक आनंद अनुभव करना ही गुरुकृपा है। इस पावन गुरुपूर्णिमा पर्व पर आइए, गुरुतत्त्व के चरणों में हम सब मिलकर प्रार्थना करें—
“हे भगवन्! हे गुरुदेव ! हमें जीवन के प्रत्येक क्षण का आनंदपूर्वक अनुभव करने की कृपा प्रदान करें। हमारे भीतर के स्वभावदोषों और अहं को दूर करने की शक्ति, तीव्र तड़प तथा निरंतर साधना करने की प्रेरणा हमें प्रदान करें।”
संदर्भ :सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले के तेजस्वी विचार
आपका नम्र,
श्री. चेतन राजहंस,
राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था



