
जयपुर,जयपुर के महिला संगठन, शक्ति फाउंडेशन द्वारा सोमवार शाम को जयपुर के होटल ग्रैंड उनियारा में पश्चिम बंगाल की पारंपरिक ‘सिंदूर खेला’ की रस्म उत्साह और उमंग के साथ निभाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत ‘सिंदूर खेला’ की परंपरा और इसके महत्व के बारे में विस्तार से बताने के साथ हुई। जिसके बाद विधिवत पूजा का आयोजन हुआ। बंगाल की पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद रंग की साड़ी में सजी-धज्जी महिलाओं ने पहले मां दुर्गा को पान के पत्ते से सिंदूर अर्पित किया, फिर एक दूसरे को सिंदूर लगाकर ‘सिंदूर खेला’ की रस्म निभाई। इस आयोजन के लिए मां दुर्गा की इको-फ्रेंडली मूर्ति, पांरपरिक वस्त्र और पूजा के थाल विशेषकर कोलकाता से मंगवाए गए थे।
रस्म के दौरान महिलाओं ने एक-एक कर मां दुर्गा की आरती की और अपने सुहाग की लंबी उम्र और अपने घर में सुख-समृद्धि की कामना की। जिसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाई और नृत्य किया। इस रस्म में न केवल विवाहित महिलाएं बल्कि अविवाहित महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और आपसी प्रेम व सौहार्द का संदेश दिया। कार्यक्रम में शक्ति फाउंडेशन की फाउंडर सोनाक्षी वशिष्ठ, को-फाउंडर शैलजा शर्मा और शिखा मेहरा सहित डॉ. सुप्रिया गुप्ता, निमिषा गुप्ता, मुंबई से निधि तोमर, रश्मि बहेती, श्रुति लूथरा, युक्ति शर्मा और चेताली सेन गुप्ता सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहीं।
इस अवसर पर शक्ति फाउंडेशन की संस्थापक, सोनाक्षी वशिष्ठ ने कहा कि “शक्ति फाउंडेशन द्वारा जयपुर में सिंदूर खेला का यह 8वां वर्ष है, जब धूमधाम से ‘सिंदूर खेला’ की रस्म निभाई गई। हमारे लिए सिंदूर खेला केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि विभिन्न वर्गों की महिलाओं को एक मंच पर लाकर नारी शक्ति, इन्क्लूसिविटी और सिस्टरहुड की भावना को बढ़ावा देने का अवसर है। समय के साथ यह आयोजन महिलाओं के आपसी मेल मुलाकात और एकजुटता का मंच बन गया है, जहां वे मिलकर समारोह का आनंद लेती हैं और खुशियां साझा करती हैं।”
सोनाक्षी ने आगे बताया कि फाउंडेशन की पहल के तहत हर वर्ष की तरह इस बार भी समारोह में युवा महिला उद्यमियों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने के लिए मंच प्रदान किया गया। इस दौरान राधिका पंचोली ने अपने स्टार्टअप ‘जयपुरोमा’ के तहत लग्जरी परफ्यूम्स; संस्कृति शर्मा और नीरल शर्मा ने ‘गिफ्ट हैम्पर्स’ ब्रांड से सेंटेड कैंडल्स, जबकि स्मिता अग्रवाल ने सूट मटेरियल के स्टॉल लगाए।
सिंदूर खेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। गौरतलब है कि दुर्गा पूजा के आखिरी दिन बंगाली समुदाय द्वारा सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है। बंगाली परंपरा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा अपने चार बच्चों के साथ धरती पर आती हैं। जब देवी अपने मायके आती हैं, तो इस अवधि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। त्योहार के अंतिम दिन उदासी का माहौल छा जाता है, जब देवी दुर्गा को विदा किया जाता है। ऐसा मानना है कि देवी दुर्गा के आंसू बहे थे, इसलिए सिंदूर अर्पित करने से पहले उनके गालों को पान के पत्तों से पोंछा जाता है। इसके बाद उनकी मांग में और पारंपरिक चूड़ियों पर सिंदूर अर्पित करते हैं। फिर महिलाएं सुखी जीवन और परिवार की खुशहाली के लिए दुर्गा मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेती हैं। बाद में सभी महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मिठाई खिलाती हैं।



