अलौकिक अनुभवों की दुनिया है इस किताब में – संजॉय रॉय

कई रातों में मैं अचानक इस एहसास से घबरा कर जाग उठता कि कोई अशुभ-सा साया मेरे ऊपर मंडरा रहा है। किसी किताब के पिछले कवर पर यदि यह पंक्ति लिखी हो और कवर पर शीर्षक हो “देअर इज़ अ घोस्ट इन माई रूम” तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितनी रोचक और अचंभित कर देने वाली किताब होगी।
संजॉय राय, जो एक आर्ट एंटरप्रेन्योर हैं और टीमवर्क आर्ट्स के एम.डी. हैं, तथा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले व्यक्तित्व हैं, वे सलाम बालक ट्रस्ट के संस्थापक-ट्रस्टी भी हैं, जो दिल्ली के सड़क और कामकाजी बच्चों के लिए सहायता सेवाएं प्रदान करता है।उनकी यह पहली किताब है। इसमें उन्होंने अपने जीवन की उन घटनाओं को दर्ज किया है जिनका संबंध अलौकिक शक्तियों और रहस्यमय अनुभवों से है। संजॉय का मानना है कि इस सृष्टि में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारी सामान्य सोच और समझ से कहीं परे है।
आइए, उनसे जानें कुछ ऐसे सवालों के जवाब, जो इस किताब को हाथ में लेते ही मन में उभरने लगते हैं –
अंशु हर्ष: किताब लिखने का विचार मन में कैसे आया ? पहली किताब के लिए आपने यह विषय क्यों चुना ?
संजॉय राय: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 17–18 साल पूरे होने पर लोग अक्सर मुझसे पूछने लगे कि मैं कब कोई किताब लिखूँगा। तब मैंने कहा मैं एक अच्छा पाठक हूँ लेखक नहीं हूँ , फिर सोचा अभी आत्मकथा लिखने के लिए तैयार नहीं हूँ , जयपुर पर कुछ लिखना नहीं चाहता था क्योंकि ये विषय राजनैतिक हो सकता है इसे लिखने में अभी समय लगेगा। लेकिन बातचीत के दौरान मैं अपने परिवार, दोस्तों और स्वयं के साथ हुए कई अलौकिक अनुभव सुनाने लगा। ये कहानियाँ सभी को बहुत पसंद आईं, और यहीं से इस किताब की शुरुआत हुई।
अंशु हर्ष: इस किताब को लिखने में आपको कितना समय लगा, और आप इसे कैसे लिख पाए ?
संजॉय राय: मुझे अपने लिए काम ही समय मिल पता है , इस किताब को पूरा होने में लगभग डेढ़ साल का समय लगा। काम के सिलसिले में मुझे अक्सर यात्रा करनी पड़ती है, इसलिए अधिकांश लेखन मैंने हवाई जहाज की उड़ानों के दौरान ही किया क्योंकि वहां मैं ना तो टी वी देखता हूँ ना ही मुझे फ़िल्में देखने का शौक है । हँसते हुए – हो सकता है कि जमीन से इतनी ऊँचाई पर भी कोई भूत मुझे इसे लिखने में मदद कर रहा हो…
अंशु हर्ष: पहली बार आपको कब एहसास हुआ कि भूत होते हैं? और आपकी प्रतिक्रिया क्या रही ?
संजॉय राय: मुझे यह पहला अनुभव तब हुआ जब मैं लगभग पाँच साल का था। यह हमारे पैतृक निवास कोलकाता—में हुआ था। बाद में दिल्ली में, अपने माता-पिता के घर पर भी मुझे ऐसे अनुभव होते रहे। मुझे हमेशा यह समझाया गया कि डरने की कोई आवश्यकता नहीं है अक्सर ये आत्माएँ हमें जीवन की राह दिखाने भी आती हैं। जीवन में कई बार मुझे ऐसे अनुभव हुए, और मैंने उन्हें इस किताब में दर्ज करने की कोशिश की है। मेरी प्रतिक्रिया हमेशा मिश्रित रही कभी डर लगा, तो कभी ऐसा भी हुआ कि इन अनुभवों ने मुझे किसी अनहोनी से बचा लिया, जिससे मैं स्वयं भी अचंभित रह गया।
जवाब यहाँ रुकता नहीं है –
ये सिलसिला कई सालों तक चला परिवार, दोस्तों और स्वयं उन्हें भारत और विदेश यात्राओं के दौरान कई जगहों पर विभिन्न प्रकार की परछाइयों, प्रेतों और रहस्यमय आकृतियों का सामना हुआ। इनमें से कुछ आत्माएँ शांत या हल्की-फुल्की शरारती थीं, लेकिन कुछ भटकी हुई और बेचैन आत्माएँ गुस्सैल थीं और उन्हें शांत करना पड़ता था। संजॉय के लिए अलौकिक को महसूस करने या उससे संवाद कर लेने की क्षमता कोई असाधारण बात नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की वास्तविकता का हिस्सा है। उनके अनुसार, शायद हमारी दुनिया के समानांतर एक और आयाम मौजूद है एक ऐसा आयाम जो आत्माओं और प्रेतों से भरा हुआ है।
अंशु हर्ष:
इस विषय पर हर तरफ़ काफी भ्रांतियाँ और तरह-तरह की बातें प्रचलित हैं। इस किताब के माध्यम से आप क्या संदेश देना चाहते हैं ?
संजॉय राय:
इस विषय पर हर प्रदेश की अपनी-अपनी मान्यताएं और कहानियां हैं उत्तर प्रदेश की अलग, बंगाल की अलग, राजस्थान की अलग। भूत-प्रेत की कहानियाँ तो हर जगह मिलती हैं। मैं न तो कोई भविष्यवक्ता हूँ और न ही तंत्र-मंत्र में डूबा हुआ व्यक्ति। मैं न किसी का भविष्य बताता हूँ और न ही अतीत में झाँकता हूँ। मैं न रहस्यवादी हूँ, न ही संशयवादी। इसलिए इस किताब के माध्यम से जैसे-जैसे आप समय, स्थान और विभिन्न आयामों की यात्रा मेरे साथ करते हैं, मैं आपको अपने निष्कर्ष स्वयं निकालने की स्वतंत्रता देता हूँ। मेरी केवल यही आशा है कि अपने आसपास देखकर आपको एहसास होगा कि हम जिन अनेक आयामों में रहते हैं, उन्हें हम पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। और जीवन जीते हुए हमें हर दिन हमारे आसपास होने वाले छोटे-बड़े चमत्कारों को अपनाना चाहिए और जो कुछ हमारे पास है, उसके लिए आभारी होना चाहिए। इस विषय पर हर प्रदेश की अपनी-अपनी मान्यताएं और कहानियां हैं उत्तर प्रदेश की अलग, बंगाल की अलग, राजस्थान की अलग। भूत-प्रेत की कहानियाँ तो हर जगह मिलती हैं।
अंशु हर्ष: इस किताब के बाद, आपकी लेखनक्षेत्र की क्या योजना है ?
संजॉय राय: इस किताब के प्रकाशित होने के बाद लोग मेरे पास आकर कहने लगे हैं “धन्यवाद, आपने इस विषय पर लिखा; हमारे पास भी ऐसी ही एक कहानी है।” मेरे पास भी कई भूत-प्रेत से जुड़ी कहानियाँ हैं जो संपादन के दौरान किताब में शामिल नहीं हो सकीं। शायद किसी समय इस विषय पर एक और किताब आ जाए और हो सकता है सबकी कहानियों का एक संकलन बनाकर भी एक किताब लिखी जा सकती है।
यह किताब कुनज़ुम बुक्स और अमेज़न इंडिया से खरीदी जा सकती है।हास्य, और रोमांच से भरपूर इस किताब को जो इसे पैरानॉर्मल पर शक करने वालों और विश्वास करने वालों दोनों पाठक पढ़ सकते है। इस किताब की भाषा बहुत सरल और ज़मीन से जुड़ी है, जो नाटकीय बिलकुल भी नहीं लगती और पाठकों को अपने निष्कर्ष स्वयं निकालने देती है। इस किताब की शैली: मेमोइर और सुपरनेचुरल ट्रैवलॉग/ नॉन फिक्शन है।
- अंशु हर्ष
( अंशु हर्ष से बातचीत क्रॉसवर्ड जयपुर में बुक साइनिंग – मीट द ऑथर – के दौरान )


