सतीश पूनिया : संवेदनशीलता, विचार और जनसेवा का सशक्त स्वर


भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया केवल एक प्रभावशाली राजनेता ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवि हृदय, चिंतक और समाज की नब्ज़ को समझने वाले जनप्रतिनिधि भी हैं। सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही है, जो राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व मानते हैं।
उनकी कविताओं में जीवन-संघर्ष, आशा, आत्मविश्वास, मानवीय संवेदनाएँ और सकारात्मक दृष्टिकोण की झलक मिलती है। शब्दों के माध्यम से वे आम जन की भावनाओं, सपनों और चुनौतियों को अभिव्यक्ति देते हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी उनका मन साहित्य और मानवीय मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
राजस्थान से राज्यसभा के लिए भाजपा द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ ही उनकी यह साहित्यिक और मानवीय पहचान भी नए आयाम प्राप्त कर रही है। उनकी कविताएँ एक संवेदनशील राजनेता के अंतर्मन की सच्ची अभिव्यक्ति हैं।
ज़िंदगी
ये जंग ही तो है
जो लड़ी है
कभी हालात से,
कभी अपने आप से।
न वो मानती, न वो जीतती,
न मैं मानता, न मैं हारता।
सोचा, बहुत हार लिये,
पहुँचकर किनारे,
पर अब न हारेंगे।
अब हर रोज़ लड़ना है,
हर रोज़ जीतना है,
जब तक हार, हार न जाए।
अब जीतेंगे
हर दम-हर कदम।
ज़िंदगी,
आ रहा हूँ मैं…
हौसला
परिंदे, रुक मत, तुझमें जान बाकी है,
मंज़िल दूर है, बहुत उड़ान बाकी है।
आज या कल मुट्ठी में होगी दुनिया,
लक्ष्य पर अगर तेरा ध्यान बाकी है।
यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरबानी,
एक से बढ़कर एक इम्तहान बाकी है।
ज़िंदगी की जंग में है हौसला ज़रूरी,
जीतने के लिए सारा जहान बाकी है।
जीवन स्वर
मन रे! कुछ गा तू,
आज नया कुछ गा।
कुछ ऐसा जो साँसों की गति को कम कर दे,
कुछ ऐसा जो पैरों में चाल नई भर दे।
कुछ ऐसा जो पहले कभी भी न गूँजा हो,
कुछ ऐसा जो जीवन को जीवन-स्वर दे।
मन कहता है
बाहर का मन कहता है, तुम कमज़ोर हो।
भीतर का मन मुझे झकझोरता है कि चल, उठ खड़ा हो,
सामर्थ्य दिखा। गाँव-गली से शहर की छाती पर
तूने कर्मा बनकर नाम लिखा है।
अब क्या-क्या डरता है?
उठ, कर सामना,
फिर देख, ज़माना कैसे क्या-क्या करता है।
तू जानता है न, कमज़ोर का भी कभी कोई हुआ है?
रोग या शोक, तूने खुद ही लड़े हैं।
तू तो माटी से उठकर खुद बना है।
जाने कितनी बार आँसू पोंछकर
जंग के लम्हे लड़े हैं।
चल उठ, कोहरा छँटने जा रहा है।
धुंध के बीच सूर्य-रश्मियाँ फिर निखर रही हैं।
चल उठ, हौसला उठा,
सूरज तेरी अगवानी में उठ खड़ा हुआ है।
दूर तक जाना है
बहुत दूर तक जाना है।
धुंध बहुत है,
रोकती, विचलित करती-सी।
लेकिन अब भय खत्म हो गया है।
एक हौसला है, जो आगे ले जा रहा है।
चल रहा हूँ इसी के साथ,
धुंध की चुनौतियों को चीरते हुए।
हौसलों से ही तो आगे जाना है।
धुंध, पड़ाव और भय के बीच
मंज़िल को तो पाना ही है।



