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भारतीय संत पर सिनेमा का नया अध्याय: आदित्य ओम की ‘संत तुकाराम – अंशु हर्ष

आदित्य ओम – एक बहुमुखी कलाकार, जिन्होंने साउथ इंडस्ट्री में तेलुगु फिल्मों से अपनी पहचान बनाई और फिर हिंदी सिनेमा में एक सफल लेखक और निर्देशक के रूप में खुद को स्थापित किया। आदित्य अपनी दमदार एक्टिंग, बेहतरीन कहानी लिखने की कला और सिनेमा के प्रति जुनून के लिए जाने जाते हैं।सवाल – इस फिल्म के डायरेक्टर और लेखक के रूप में आपने क्या तैयारी की? यह विषय गहराई और संवेदनशीलता से जुड़ा है, तो इसे पर्दे पर लाने में आपने किन बातों का ध्यान रखा?”
आदित्य – जब मैंने ‘संत तुकाराम’ पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया, तो सबसे पहले मैंने उनकी जीवनी, अभंग और उनके समय के सामाजिक संदर्भ को गहराई से समझा। मैंने कई ऐतिहासिक ग्रंथ, साहित्य और लोक कथाएं पढ़ीं ताकि कहानी तथ्यात्मक और भावनात्मक दोनों स्तर पर मजबूत हो। एक निर्देशक के तौर पर मेरी कोशिश रही कि हर फ्रेम संत तुकाराम के जीवन की सच्चाई और भक्ति का संदेश दे। मैंने पूरी टीम को भी यही भावना समझाई कि यह फिल्म सिर्फ एक बायोग्राफिकल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। हमने लोकेशन, कॉस्ट्यूम, डायलॉग्स सब कुछ प्रामाणिक रखने की कोशिश की।
सवाल – संत तुकाराम की जीवनी को पर्दे पर उतारने का विचार कैसे आया?
आदित्य – इस फिल्म के निर्माता बी गौत्तम ने मेरी पिछली फिल्मों का काम देखा था और वे मुझ तक पहुंचे , उनकी इच्छा थी कि वे अपने इष्ट देव विठ्ठल पर एक फिल्म बनाएं। जब हमने इस विषय पर बातचीत शुरू की, तो संत तुकाराम का व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। तभी यह तय हुआ कि हम इस अद्भुत संत की जीवन गाथा को पर्दे पर लाएँगे और यहीं से इस यात्रा की शुरुआत हुई।
सवाल – सिनेमा आजकल मनोरंजन का साधन माना जाता है। ऐसे में ‘संत तुकाराम’ जैसी फिल्में क्या उस श्रेणी में आती हैं?
आदित्य – सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं है, यह समाज का दर्पण और विचारों का माध्यम भी है। ‘संत तुकाराम’ जैसी फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनाई जातीं, बल्कि वे दर्शकों को प्रेरणा देती हैं और जीवन के मूल्यों से जोड़ती हैं। यह फिल्म दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभव के साथ-साथ यह संदेश देती है कि प्रेम, समानता और भक्ति ही मानवता की असली ताकत हैं। मुझे लगता है मनोरंजन तब सार्थक होता है जब वह मन और आत्मा को छू सके, और यह फिल्म उसी श्रेणी में आएगी।
सवाल – यह फिल्म अब तक बनी संत तुकाराम पर आधारित फिल्मों से कैसे अलग है?
आदित्य – हमारी फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पहली हिंदी फिल्म है जो संत तुकाराम पर बनी है। इससे पहले संत तुकाराम पर मशहूर मराठी फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन हिंदी दर्शकों के लिए यह पहली बार होगा। हमने संत तुकाराम को सिर्फ एक धार्मिक संत के रूप में नहीं दिखाया, बल्कि एक ऐसे समाज सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया है, उन्होंने छुआछूत, जातिवाद और पाखंड के खिलाफ आवाज़ उठाई। तकनीकी दृष्टि से भी यह फिल्म बेहद समृद्ध है। सिनेमैटोग्राफी, संगीत और प्रामाणिक लोकेशन के साथ इसे आज की पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यह सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक और प्रेरणादायक अनुभव है।



