
इंटरनेशनल डॉग डे के अवसर पर, मैं अपने जीवन की सबसे ख़ास भावनाएँ आपसे शेयर करना चाहता हूँ। लीज़ा और लैला मेरी दो प्यारी डॉग्स हैं, जो पिछले ग्यारह वर्षों से मेरे साथ हैं। वे सिर्फ पालतू जानवर नहीं, बल्कि मेरे परिवार का हिस्सा हैं।
मेरे दिन का शायद ही कोई ऐसा पल हो, जब उनका साथ न हो। जब मैं घर पर रहता हूँ तो वे हर वक़्त मेरे आगे-पीछे घूमती रहती हैं, रात को भी मेरे कमरे में सोती है और जब मैं बाहर से लौटता हूँ तो अपने ढंग से मुझसे बातें करती हैं। उनकी आंखों और उनके हाव-भाव में एक अपनापन झलकता है, मानो कुछ पूछ रही हों, कुछ कह रही हों। मुझे हमेशा लगता है कि जानवरों में भी सोचने-समझने की शक्ति होती है, बस वे बोल नहीं पाते। उनकी ख़ामोशी में भी एक गहरी भाषा है, जिसे महसूस किया जा सकता है। हर त्योहार, हर उत्सव, हर खुशी और हर मुश्किल में वे मेरे साथ खड़ी रहती हैं मुझे भी उनके बिना अधूरा महसूस होता है। इंसान और जानवर का रिश्ता शब्दों से कहीं आगे हैये एक जुड़ाव है जहां निस्वार्थ प्यार है और लीज़ा लैला मेरे जीवन में इस बात का सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
– सुधीर माथुर


