HINDILIFESTYLELITERATURENATIONAL

रूहानी भावों और कथक की अनुपम अभिव्यक्ति से सजी रूपा रानी दास बरुआ की मनमोहक प्रस्तुति

राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में आयोजित “कलर्स ऑफ असम” कार्यक्रम के अंतर्गत लखनऊ घराने की प्रतिभाशाली कथक नृत्यांगना रूपा रानी दास बरुआ की मनमोहक कथक प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। रूपा रानी ने कथक की प्रारंभिक शिक्षा गुवाहाटी में श्री बिपुल चंद्र दास से प्राप्त की। इसके पश्चात वे लखनऊ गईं, जहाँ उन्होंने स्वर्गीय सुभाष दीक्षित तथा श्रीमती बीना सिंह से प्रशिक्षण लिया। आगे चलकर उन्होंने लखनऊ घराने के प्रसिद्ध कथक गुरु स्वर्गीय सुरेंद्र सैकिया के सान्निध्य में कथक की उच्च शिक्षा प्राप्त की।

रूहानी भावों और कथक की अनुपम अभिव्यक्ति से सजी इस प्रस्तुति की शुरुआत श्री गणेश वंदना से हुई। नृत्यांगना ने अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम से बुद्धि और सिद्धि के दाता श्री गणेश को नमन किया। जैसे ही मंच पर घुंघरुओं की मधुर ध्वनि और संगीत की स्वर लहरियाँ गूंजीं, पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और सौंदर्य से भर उठा। प्रस्तुति का प्रारंभ तीनताल विलंबित लय में “ठाठ, उठान, आमद और तिहाई” से हुआ। कथक की गंभीरता, नज़ाकत और लयकारी का अद्भुत संगम दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गहराइयों तक ले गया। प्रत्येक मुद्रा, पद संचालन और भावाभिव्यक्ति में वर्षों की साधना की स्पष्ट झलक दिखाई दी। इसके बाद तीनताल मध्यलय में “परनजोड़ी आमद, टुकड़ा, परमेलू और परन” की प्रस्तुति ने ताल और तकनीक का आकर्षक संसार रचा। नृत्यांगना ने अपनी नियंत्रित गति, प्रभावशाली चक्करों और सटीक पाद संचालन से दर्शकों को अभिभूत कर दिया।

इस सांगीतिक संध्या का एक अत्यंत भावपूर्ण आयाम था डॉ. भूपेन हजारिका के असमिया गीत पर आधारित अभिनय प्रस्तुति। यह गीत मानवीय संवेदनाओं, एकांत, प्रेम, विरह और आत्मिक अनुभूतियों का गहरा दार्शनिक चित्रण प्रस्तुत करता है। नृत्य के माध्यम से उन अनकहे भावों को जीवंत किया गया, जो अक्सर शब्दों में व्यक्त नहीं हो पाते। शांत रात की नीरवता में मन के भीतर गूंजते अदृश्य गीत को कलाकार ने अपनी अभिव्यक्ति से अत्यंत संवेदनशील रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद तीनताल द्रुत लय में गत, परन और अन्य तकनीकी प्रस्तुतियों ने कथक की ऊर्जा और चपलता का प्रभावशाली परिचय दिया। तीव्र लय में घूमते चक्कर, सशक्त पद संचालन और ताल के साथ सटीक सामंजस्य ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।अभिनय पक्ष में “कहूँ कैसे सखी मोहे लाज लगे, मोहे पी की नजरिया मार गई” की प्रस्तुति ने श्रृंगार रस की कोमल भावनाओं को सुंदरता से अभिव्यक्त किया। वहीं अमीर खुसरो की सूफियाना रचना “मोहे अपने ही रंग में रंग ले” ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। यह प्रस्तुति आत्मा और परमात्मा के मिलन की तड़प, समर्पण और प्रेम की गहराई को दर्शाती रही। नृत्यांगना ने अपनी भावभंगिमाओं से सूफी दर्शन की आत्मिक अनुभूति को जीवंत कर दिया।

इस संपूर्ण कथक प्रस्तुति को मंच पर उपस्थित प्रतिष्ठित संगत कलाकारों ने संगीत और स्वर का सशक्त साथ प्रदान किया। गायन में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित साधक पंडित माधो प्रसाद जी ने अपनी सुरमयी आवाज़ से प्रस्तुति को भावपूर्ण ऊँचाइयाँ दीं। तबले पर उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कलाकार श्री राजीव शुक्ला जी ने अपनी लयकारी और बारीकियों से कार्यक्रम में ऊर्जा भर दी। सारंगी पर अनिल मिश्रा जी ने सुरों में भावनाओं की आत्मीयता घोली, जबकि सितार पर श्री सलीम कुमार जी ने अपनी मधुर धुनों से पूरे वातावरण को संगीतमय बना दिया।

यह प्रस्तुति केवल एक नृत्य कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत, कथक, सूफी दर्शन और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुंदर संगम थी, जिसने दर्शकों को कला और आध्यात्म की एक अनूठी यात्रा का अनुभव कराया।

रूपा रानी दास बरुआ ने वर्ष 2003 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) से कथक नृत्य में स्नातकोत्तर उपाधि विशिष्ट योग्यता के साथ प्राप्त की तथा वर्ष 2001 में भातखंडे संगीत संस्थान, लखनऊ से कथक नृत्य में ‘निपुण’ (पी.जी.) की उपाधि अर्जित की। इसके अतिरिक्त उन्होंने उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ के कथक केंद्र से कथक नृत्य में प्रोफेशनल कोर्स का डिप्लोमा भी प्राप्त किया। वे दूरदर्शन केंद्र, दिल्ली की ‘ए’ ग्रेड की मान्यता प्राप्त कलाकार हैं तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), दिल्ली में भी सूचीबद्ध कलाकार हैं।

  • ​अंशु हर्ष

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *