“मेरे ख़याल मेरे अपने थे, सो लिख डाले” – डॉ पैमला एफ. एरिक्सन ऊषा

77 वर्ष की उम्र में प्रकाशित अपने पहले कविता-संग्रह ‘मेरे ख़्वाबों-ख़यालों के गुंचे’ के साथ डॉ. पैमला एफ. एरिक्सन ऊषा ने अपने भीतर वर्षों से संजोए अनुभवों, स्मृतियों और भावनाओं को शब्द दिए हैं। अंशु हर्ष से बातचीत में वे अपने लेखन, जीवन के अनुभवों, स्त्री मन, बचपन की यादों को साझा किया –
- प्रश्न – मेरे ख़्वाबों-ख़यालों के गुंचे’ आपका पहला कविता-संग्रह है। आपने अपने ख़्वाबों और ख़यालों को ‘गुंचे’ यानी कलियों के रूप में क्यों देखा?
- प्रश्न – आपकी एक पंक्ति बहुत गहरी है “क्योंकि मैं एक लड़की हूँ जिसका अपना कोई घर नहीं होता।” लेकिन ख़याल तो अपने थे सो लिख डाले – इस ‘घर’ को आप केवल एक भौतिक जगह के रूप में देखती हैं या यह स्त्री की पहचान और अपनेपन से जुड़ा कोई बड़ा सवाल है?
- प्रश्न: आप 77 वर्ष की हैं। उम्र के इस पड़ाव पर आपकी पहली कविता-पुस्तक का आना आपके लिए क्या मायने रखता है? क्या आपको लगता है कि जीवन के अनुभव कविता को अधिक गहराई देते हैं?
उत्तर: किताबें बचपन से ही मेरी दोस्त और मेरी साथी रही हैं। इसलिए उम्र के इस पड़ाव पर मेरी अपनी किताब का पाठकों के बीच आना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण और भावुक करने वाला क्षण है। मुझे लगता है कि उम्र के साथ जीवन हमें बहुत कुछ सिखाता है। रिश्ते, अनुभव, स्मृतियाँ, सुख-दुःख और जीवन के अलग-अलग पड़ाव हमारे भीतर बहुत कुछ जमा करते जाते हैं। शायद यही अनुभव कविता को गहराई देते हैं।मैं यह भी सोचती हूँ कि हम औरतें कई बार एक जैसा महसूस करती हैं, एक जैसे अनुभवों से गुजरती हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई अपने भाव कह पाता है और कोई उन्हें मन में ही रख लेता है। मुझे लगता है कि मेरी कविताएँ शायद उन अनकहे भावों को शब्द दे पाएँगी। मेरी इच्छा है कि जो भी इन्हें पढ़े, वह कहीं न कहीं अपनी कहानी, अपनी स्मृति, अपना कोई भाव इनमें खोजने की कोशिश करे और शायद उस तलाश में उसे अपना ही कोई रूप मिल जाए।
- प्रश्न: आज की पैमला, अगर अपने बचपन वाली पैमला से मिलें, तो उससे क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: मैं अपने बचपन वाली पैमला से मिलूँ तो सबसे पहले उसे यही कहना चाहूँगी कि तुम्हारे पास जो अनुभव हैं, वे तुम्हारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। मेरे माता-पिता और दादा-दादी ने मुझे जीवन को बहुत करीब से देखने और समझने के अवसर दिए। हमने अपने बचपन में कुम्हार का चाक घूमते देखा है, बुनकरों को दरियाँ बुनते देखा है। यानी जीवन के हर काम को बहुत व्यावहारिक रूप से देखा और समझा है। उस समय शायद इन अनुभवों की कीमत का अंदाज़ा नहीं था, आज के बच्चों के पास शायद ऐसे अनुभव बहुत कम हैं। इसलिए मैं आज की पैमला से यही कहूँगी कि तुम्हें जीवन को इतने करीब से देखने, महसूस करने और जीने का जो अवसर मिला है, उसे कभी कम मत समझना।एक और बात, जो मेरे लिए अपने आप में बहुत अनूठी है मैंने अपना पूरा जीवन एक ही शहर, अजमेर में बिताया है। यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं पढ़ाई की, नौकरी की, शादी हुई और जीवन के लगभग हर पड़ाव को इसी शहर में जिया। एक ही शहर में रहकर पूरी ज़िंदगी गुज़ार देना एक तरह की नेमत है, जो हर किसी के हिस्से में नहीं आती।आज जब पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखती हूँ तो अपने आप से यही कहती हूँ पैमला, तुमने बहुत ख़ूब जीवन जिया है। बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सीखा और बहुत कुछ महसूस किया। यही अनुभव शायद आज मेरे शब्दों में भी उतर आए हैं।
- प्रश्न: क्या ‘मेरे ख़्वाबों-ख़यालों के गुंचे’ के बाद पाठकों को आपकी ओर से और भी किताबों की उम्मीद करनी चाहिए?
उत्तर: बिल्कुल। मैं एक और किताब पर काम कर रही हूँ, जो मेरी कहानी होगी, लेकिन अपने जीवन के अनुभवों को मैं उसमें कुछ अलग अंदाज़ में लिखना चाहती हूँ। मेरे जीवन में बहुत से ऐसे अनुभव रहे हैं, जिन्हें मैंने करीब से देखा और महसूस किया है। एक डॉक्टर होने के नाते मुझे बहुत-सी स्त्रियों के दर्द को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला है। कई बार लोग मेरे पास आकर अपने मन की ऐसी बातें साझा करते हैं, जो शायद वे हर किसी से नहीं कह पाते।इन अनुभवों ने मुझे जीवन और लोगों को एक अलग नज़र से देखने की दृष्टि दी है।मेरी अगली किताब में मेरे जीवन के अनुभवों के साथ-साथ इन मुलाकातों और भावनाओं की भी एक झलक होगी। इसके अलावा, अपने शहर अजमेर को मैंने जिस तरह देखा, जिया और महसूस किया है, उसे भी अपनी नज़र से कहने की कोशिश करूँगी। इसलिए अगली किताब मेरे लिए केवल मेरी कहानी नहीं होगी, बल्कि मेरे जीवन में आए लोगों, उनके अनुभवों और मेरे शहर के साथ मेरे रिश्ते की भी कहानी होगी। उम्मीद है, पाठक उसे भी उसी अपनत्व से पढ़ेंगे, जिस तरह ‘मेरे ख़्वाबों-ख़यालों के गुंचे’ को पढ़ेंगे।
- अंशु हर्ष



