मेरी किताबों में – शब्दों में जीवन है और सवालों में ईश्वर – जगदीप सिंह


कुछ लेखक शब्दों को लिखते हैं और कुछ अपने अनुभवों, प्रश्नों और जीवन-दृष्टि को शब्दों में ढालते हैं। जगदीप सिंह की कविताओं में जीवन और मृत्यु, आस्था और अनास्था, मनुष्य और ईश्वर के बीच का वही जटिल संवाद दिखाई देता है। उनकी पहली पुस्तक My Epitaph से लेकर When Gods Don’t Matter तक की यात्रा केवल दो कविता-संग्रहों की यात्रा नहीं, बल्कि एक ऐसे कवि की वैचारिक यात्रा है, जो जीवन के सबसे कठिन और असहज सवालों से भी आँख मिलाकर बात करता है। इन्हीं पहलुओं पर जगदीप सिंह से हुई अंशु हर्ष की बातचीत हुई जिसमें उनकी कविता, जीवन-दृष्टि, ईश्वर, मृत्यु, साहित्यिक प्रभाव और रचनात्मक अनुशासन के साथ-साथ पीआर की व्यस्त दुनिया के बीच सृजन और साहित्य को जीवित रखने की चुनौती पर भी बात की।

प्रश्न – आपकी पहली पुस्तक का नाम “My Epitaph” था और दूसरी पुस्तक का नाम “When Gods Don’t Matter” है। दोनों ही शीर्षक जीवन और मृत्यु के बहुत गहरे दर्शन से जुड़े हैं। इस विचार यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई?
उत्तर- देखिए, इस यात्रा शुरुआत किसी एक घटना से नहीं हुई, बल्कि जीवन को देखने और समझने की मेरी अपनी यात्रा से हुई। पुस्तक का शीर्षक ‘माय एपिटॉफ’ सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु से जुड़ा नहीं है। ‘माय एपिटॉफ’ एक कविता भी है, जिसे मैंने 1997 में लिखा था। उस समय मुझे महसूस होने लगा था कि जिंदगी बस बीती जा रही है, लेकिन मैंने अभी तक कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं की है। ऐसा लगने लगा था कि कहीं मेरा वजूद ही खोता जा रहा है। हालांकि, इस संकलन में जीवन और मृत्यु से जुड़े कई अन्य भाव और कविताएं भी शामिल हैं। जीवन का एक सत्य मृत्यु भी है, जिसे कोई टाल नहीं सकता।
वहीं, दूसरी पुस्तक के शीर्षक ‘व्हेन गॉड्स डोंट मैटर’ की बात करूं तो, संकलन में शामिल यह एक कविता है, जो कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान मैंने लिखी थी। जब हमारे परिवार, दोस्त और परिचित जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे, तब मन में कई सवाल और भाव उमड़ रहे थे। यह कविता भगवान से मेरी एक तरह की अपील थी कि यह मुश्किल समय जल्द खत्म हो और हालात सुधर जाएं। इस संकलन में कोविड काल की व्यथा के साथ-साथ अधूरी प्रेम कहानियां, नॉस्टेलजिया और रोजमर्रा की जिंदगी की वास्तविकताओं से जुड़ी कई कविताएं भी शामिल हैं।
प्रश्न – “जब ईश्वर मायने नहीं रखते” यह शीर्षक बहुत सशक्त और झकझोरने वाला है। कोविड के आईसीयू, वेंटिलेटर और लाचारी के उस दौर ने ईश्वर और इंसान के रिश्ते के प्रति आपकी सोच को किस तरह बदला? क्योंकि किताब का यह शीर्षक वही से निकल कर आया है।
उत्तर- हां, यह केवल इस संकलन का शीर्षक ही नहीं, बल्कि इस संकलन में शामिल एक कविता भी है। यह कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान के मेरे अनुभवों की अभिव्यक्ति है। जब मैंने आईसीयू और वेंटिलेटर पर लोगों की बेबसी को बहुत करीब से देखा, जब अपने लोग जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे और हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे, तब मन में भगवान से बहुत से सवाल उठने लगे। हम हमेशा मानते आए हैं कि मुश्किल समय में ईश्वर हमारे साथ हैं, लेकिन उस समय कई बार ऐसा लगा कि हम मदद के लिए पुकार रहे हैं और कोई जवाब नहीं मिल रहा। ‘व्हेन गॉड्स डोंट मैटर’ कविता उसी पीड़ा, असहायता और भगवान से किया गया मेरा संवाद है। यह ईश्वर पर शंका नहीं है, बल्कि उस दौर में इंसान और ईश्वर के रिश्ते को लेकर मेरे भीतर उठे सवालों की अभिव्यक्ति है।
प्रश्न – आपने टी.एस. एलियट, येट्स, सिल्विया प्लैथ, जेम्स जॉयस और सार्त्र जैसे दिग्गजों पर कविताएं लिखी हैं। इन महान विचारकों ने एक कवि के रूप में आपके दृष्टिकोण को कैसे आकार दिया?
उत्तर – इन कविताओं के माध्यम से मैंने टी.एस. एलियट, डब्ल्यू.बी. येट्स, सिल्विया प्लैथ, जेम्स जॉयस, एस.टी. कोलरिज और ज्यां-पाल सार्त्र जैसे अपने कुछ पसंदीदा लेखकों और विचारकों को श्रद्धांजलि दी है। खास तौर पर टी.एस. एलियट और सिल्विया प्लाथ के जीवन और लेखन ने मुझे हमेशा से काफी प्रभावित किया है। उनकी रचनाओं ने मुझे जीवन, अकेलेपन, भावनाओं और इंसान के भीतर चलने वाले संघर्षों को अलग नजर से देखने में मदद की। उन्होंने मेरे अपने लेखन और सोच को भी आकार दिया।
प्रश्न – आप कहते है – आप बहुत अधिक लिखने वाले (prolific) कवि नहीं हैं और 50 कविताएँ 5 वर्षों की मेहनत का परिणाम हैं। आपके लिए किसी कविता का अंतिम रूप देना कितना सब्र का काम होता है?
उत्तर- एक अंग्रेजी में टर्म है ‘पिकल इफेक्ट’, जिसमें मेरा विश्वास है। मेरा मानना है कि कविताएं आप बैठकर प्लान करके नहीं लिखते, बल्कि वे आपके भीतर के भावों के रूप में अपने आप उभरती हैं। मैं उन लेखकों में से नहीं हूं जो रोज लिखते हैं। जब कोई कविता मन में आती है, तो मैं उसे लिखने के बाद कई बार पढ़ता और रिवाइज करता हूं। उसमें बदलाव करता रहता हूं, जब तक मुझे यह न लगे कि अब यह अपने सही रूप में आ गई है। उसके बाद ही मैं उसे अंतिम रूप देता हूं।
प्रश्न – पीआर (PR) की दुनिया में हर समय रणनीति, हेडलाइंस और रफ्तार की ज़रूरत होती है, जबकि कविता के लिए ठहराव और शांति चाहिए। आप इन दोनों बिल्कुल अलग दुनिया को एक साथ कैसे संभालते हैं?
उत्तर – बिल्कुल, मेरी कविताएं ज्यादातर रात के समय लिखी गई हैं। कुछ वर्षों पहले की बात करूं जब मुझे इन्सोमनिया था और मैं रात को सो नहीं पाता था। तब रात की खामोशी में मेरे भाव उमड़ कर आते थे और तब मैं सुबह उठकर इन्हें पन्ने पर उतारता था। मैं मानता हूं कि कवि एक जौहरी की तरह होता है, जिसे अपने शब्दों को मोतियों की तरह बड़ी बारीकी के साथ चुनना चाहिए। कविताओं की भाषा और शब्द भले ही सरल हो, लेकिन उनके मायने गहरे हो सकते हैं।
प्रश्न – जो युवा जनसंपर्क (PR) के क्षेत्र में आ रहे हैं और साथ ही अपने अंदर के लेखक को भी जीवित रखना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगे? काम के भारी दबाव के बीच अपनी क्रिएटिविटी (सृजनात्मकता) को खोने से कैसे बचाया जा सकता है?
उत्तर- पीआर प्रोफेशनल का काम निश्चित रूप से तेज रफ्तार और समय की मांग करता है, लेकिन मेरी सलाह यही होगी कि अपने लिए थोड़ा समय निकालना जरूरी है। क्रिएटिविटी को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप अपने काम से बाहर की दुनिया से भी जुड़े रहें। अलग-अलग किताबें पढ़ें, लोगों से मिलें, नए अनुभव लें और अपने विचारों को नोट करते रहें। कई बार वही छोटी-सी बात आगे चलकर किसी लेख, कविता या कहानी का आधार बन जाती है। मेरे लिए लिखना किसी दबाव का काम नहीं, बल्कि अपने भीतर के विचारों को अभिव्यक्त करने का एक तरीका है।
प्रश्न – अब तक आपने पाठकों को अपनी कविताओं के ज़रिए प्रभावित किया है। क्या भविष्य में कोई गद्य (Prose), संस्मरण (Memoir) या उपन्यास लिखने की योजना है।
उत्तर- वर्तमान में मैं जयपुर की वरिष्ठ पत्रकार, कल्चर एक्सपर्ट और लेखिका स्वाति वशिष्ठ के साथ मिलकर एक कविता संग्रह के संकलन पर काम कर रहा हूं। इसमें राजस्थान के करीब 18 इंडो-इंग्लिश लेखकों की कविताओं को शामिल किया जा रहा है। उम्मीद है कि यह पुस्तक अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में प्रकाशित हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, मैं एक नोवेला पर भी काम कर रहा हूं।



