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‘मिरेकल एट हाइफा: द मास्टर एंड द महाराजास’ पुस्तक पर चर्चा

जयपुर, “हाइफा का युद्ध भारतीय सेना के लिए एक आत्मघाती मिशन था, उसके बावजूद यह एक गौरवशाली विजय में बदल गया,” यह बात मेजर चंद्रकांत सिंह ने रविवार को अशोक क्लब में आयोजित पुस्तक चर्चा के दौरान कही। यह कार्यक्रम प्रभा खेतान फाउंडेशन की ‘सहयोग’ पहल के तहत आयोजित किया गया। मेजर चंद्रकांत सिंह ने अजय सिंघा के साथ संवाद किया। सत्र में इतिहास, सैन्य विरासत और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। साथ ही, दर्शकों को एक ऐतिहासिक घटना को व्यापक संदर्भ में देखने और यह समझने का अवसर मिला कि इतिहास किस प्रकार वर्तमान को प्रभावित करता है और भविष्य को समझने में मदद करता है।

चर्चा के दौरान 23 सितंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान माउंट कार्मेल की पहाड़ियों पर लड़ा गया हाइफा का युद्ध केंद्रित में रहा। यह युद्ध भारतीय घुड़सवार सैनिकों की अदम्य वीरता के लिए जाना जाता है। भारतीय सैनिक मुख्य रूप से तलवारों और भालों से लैस थे, जबकि उनके सामने राइफलों, मशीनगनों और तोपों से लैस ऑटोमन सेना थी। इसके बावजूद भारतीय घुड़सवार सैनिकों ने दुश्मन सेना को पराजित कर बड़ी संख्या में सैनिकों को बंदी बनाया। यह युद्ध सैन्य इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज है।

पुस्तक पर चर्चा करते हुए मेजर चंद्रकांत सिंह ने बताया कि हाइफा के युद्ध के चार प्रमुख ऐतिहासिक प्रभाव रहे। पहला, इस युद्ध ने प्रथम विश्व युद्ध के अंत को तेज किया और तुर्की के पतन और 1924 में करीब 1400 वर्ष पुराने इस्लामी खिलाफत के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया। उनके अनुसार, इससे उत्पन्न राजनीतिक शून्य को आज भी आईएसआईएस, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन तथा सऊदी और ईरानी नेतृत्व द्वारा भरने के प्रयास किए जाते हैं। दूसरा, अब्दुल-बहा को फांसी से बचाए जाने से बहाई धर्म के अस्तित्व को बचाने में मदद मिली, जिसके एकता और समानता के सिद्धांत उपनिषदों की विचारधारा से समानता रखते हैं। तीसरा, केवल भारतीय अधिकारियों के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों की वीरता ने ब्रिटेन को भारतीयों के लिए किंग्स कमीशन देने और सैंडहर्स्ट में भारतीयों के लिए प्रवेश खोलने की दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर किया। मेजर सिंह के अनुसार, आगे चलकर इस प्रक्रिया ने भारत की स्वतंत्रता की राह को भी प्रभावित किया। चौथा, इस युद्ध के बाद फिलिस्तीन पर ऑटोमन शासन का अंत हुआ और वहां ब्रिटिश शासनादेश लागू हुआ। इसके बाद यहूदी प्रवासन बढ़ा और आगे चलकर इजरायल के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कार्यक्रम का समापन एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ। इससे पहले स्वागत संबोधन जगदीप सिंह ने दिया, जबकि तुषारिका सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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