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इच्छा मृत्यु : आध्यात्मिक वरदान से न्यायिक व्यवस्था तक – अंशु हर्ष 

द्वापर युग के संदर्भ में जब हम “इच्छा मृत्यु” शब्द सुनते हैं, तो सबसे पहले स्मरण होता है महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह का। उन्हें यह अद्भुत वरदान प्राप्त था कि वे अपनी इच्छा से मृत्यु का समय चुन सकते थे। महाभारत के युद्ध में जब वे शरशैया पर लेटे थे, तब उनके शरीर में असंख्य बाण विद्ध थे, फिर भी उन्होंने अपने प्राण नहीं त्यागे। अपनी आध्यात्मिक योग शक्ति और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। पुराणों के अनुसार, उन्होंने यह निश्चय किया था कि जब तक वे हस्तिनापुर को सुरक्षित और स्थिर नहीं देख लेंगे, तब तक वे शरीर नहीं त्यागेंगे। जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब उन्होंने अपनी इच्छा से प्राण त्यागे। उस समय “इच्छा मृत्यु” का अर्थ आध्यात्मिक साधना, योगबल और आत्मसंयम से जुड़ा हुआ था।

किन्तु कलयुग में “इच्छा मृत्यु” की अवधारणा आध्यात्मिक वरदान के रूप में नहीं, बल्कि चिकित्सा, नैतिकता और कानून से जुड़ी हुई है। आज के समय में यह विषय न्यायिक और मानवीय दृष्टि से समझा जाता है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट  ने “पैसिव यूथेनेशिया” के माध्यम से असाध्य रोगों से पीड़ित और लंबे समय से जीवन रक्षक उपकरणों पर निर्भर मरीजों के लिए कुछ परिस्थितियों में इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है।

अर्थात द्वापर युग में इच्छा मृत्यु एक दिव्य वरदान और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक थी, जबकि आज के कलयुग में यह मानवीय पीड़ा, चिकित्सा निर्णय और न्यायिक व्यवस्था के संतुलन के रूप में समझी जाती है। दोनों ही प्रसंग हमें यह सिखाते हैं कि जीवन के अंतिम क्षणों में गरिमा, धैर्य और मानवीय संवेदना का कितना गहरा महत्व है।

भारत में जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक, मानवीय और कानूनी प्रश्नों के बीच एक महत्वपूर्ण पड़ाव उस समय सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे समय से कोमा में पड़े व्यक्ति के मामले में इच्छा मृत्यु से जुड़े विषय पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह निर्णय न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उस संवेदनशील प्रश्न को भी सामने लाता है कि जीवन के अंतिम क्षणों में व्यक्ति की गरिमा और पीड़ा को किस प्रकार समझा और सम्मानित किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 वर्षों से अधिक समय से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की अनुमति दे दी है। यह फैसला जस्टिस जे बी पारदीवाला  और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यह  प्रक्रिया पूरी तरह व्यवस्थित, मानवीय और गरिमापूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। अदालत ने  एम्स  नई दिल्ली को निर्देश दिया है कि वह लाइफ़ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया के लिए एक विस्तृत और मानवीय योजना तैयार करे। इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपचार रोकने की प्रक्रिया के दौरान मरीज़ को किसी प्रकार की पीड़ा न हो और उसकी गरिमा तथा सम्मान पूरी तरह सुरक्षित रहे।

हरीश राणा के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए वर्ष 2018 में दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने असाध्य और लाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए “पैसिव यूथेनेशिया” यानी इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दी थी।

पैसिव यूथेनेशिया का तात्पर्य यह है कि यदि कोई मरीज लंबे समय से कोमा में है या ऐसी अवस्था में है जहां उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं बची है और वह केवल जीवन रक्षक मशीनों के सहारे जीवित है, तो चिकित्सकीय निर्णय और परिवार की सहमति से धीरे-धीरे लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है। इसका उद्देश्य कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा खींचने के बजाय व्यक्ति को सम्मानजनक अंत देना है।

भारत में इस विषय पर न्यायिक बहस का सबसे बड़ा संदर्भ अरुणा शानबाग का मामला रहा है। मुंबई के केईएम अस्पताल  की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में एक क्रूर हमले का शिकार हुई थीं। अस्पताल के एक कर्मचारी सोहनलाल ने उनके साथ हिंसक अपराध किया, जिसके कारण उनका मस्तिष्क गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया और वह स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में चली गईं। अरुणा शानबाग लगभग 42 वर्षों तक इसी अवस्था में रहीं। वर्ष 2009 में उनकी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने की अपील की गई थी। हालांकि अदालत ने उन्हें इच्छा मृत्यु देने की अनुमति नहीं दी, बाद में 18 मई 2015 को निमोनिया के कारण 68 वर्ष की आयु में अरुणा शानबाग का निधन हो गया। लेकिन वर्ष 2011 में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने “पैसिव यूथेनेशिया” को कुछ शर्तों के साथ कानूनी मान्यता दे दी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस विषय को और स्पष्ट करते हुए “लिविंग विल” या “अग्रिम निर्देश” की अवधारणा को मान्यता दी। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह इच्छा व्यक्त कर सकता है कि यदि वह भविष्य में असाध्य बीमारी या स्थायी कोमा की स्थिति में पहुंच जाए, तो उसके जीवन रक्षक उपकरण हटा दिए जाएं।

जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशानिर्देशों को और व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ संशोधन भी किए। इन संशोधनों के तहत मेडिकल बोर्ड के निर्णय के लिए समयसीमा तय की गई और पूरी प्रक्रिया को कम जटिल बनाने के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका को सीमित किया गया। हरीश राणा के मामले में पहले दिल्ली हाई कोर्ट  ने याचिका खारिज कर दी थी। अदालत का कहना था कि राणा मैकेनिकल लाइफ़ सपोर्ट पर नहीं हैं और वह बाहरी सहायता के बिना भी जीवित रह सकते हैं। इसके बाद परिवार ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उस समय उन्हें राहत नहीं मिली, लेकिन अदालत ने यह अनुमति दी कि आवश्यकता पड़ने पर वे दोबारा याचिका दायर कर सकते हैं। परिवार ने एक बार फिर सर्वोच्च अदालत में अपील की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एम्स को निर्देश दिया कि वह मरीज को घर से अस्पताल में स्थानांतरित करने की व्यवस्था करे और उपचार रोकने की पूरी प्रक्रिया को मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप संचालित करे।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि भारत में “एंड-ऑफ-लाइफ़ केयर” को लेकर कोई व्यापक कानून मौजूद नहीं है। अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह इस विषय पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने पर विचार करे, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में परिवारों, डॉक्टरों और मरीजों के अधिकारों को लेकर कोई अस्पष्टता न रहे।

यह निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं है, बल्कि यह उस गहरे मानवीय प्रश्न की ओर भी संकेत करता है कि जीवन की अंतिम अवस्था में व्यक्ति की गरिमा, पीड़ा और परिवार की भावनाओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में “गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार” पर चल रही बहस को एक नई दिशा देता है और यह बताता है कि कानून केवल नियमों का ढांचा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का भी प्रतिबिंब होता है।

– अंशु हर्ष

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