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महाभारत के हनुमान है – पांडुपोल हनुमान

हनुमान जी को कलयुग में “प्राकट्य देवता” के रूप में विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटे, तब उन्होंने उन सभी वीरों को सम्मान और उपहार प्रदान किए जिन्होंने रावण के विरुद्ध धर्मयुद्ध में उनका साथ दिया था। उस समय हनुमान जी ने अत्यंत विनम्र भाव से श्रीराम से एक अद्भुत वरदान माँगा “प्रभु, इस पृथ्वी पर जब तक आपकी कथा का प्रचार होता रहे, तब तक मेरे प्राण इसी शरीर में बने रहें।” भगवान श्रीराम ने उनके इस निष्काम भाव और अटूट भक्ति को स्वीकार किया और उन्हें कहा कि ” जब तक ये लोक रहेंगे तुम पृथ्वी पर रहकर शांति, प्रेम और ज्ञान का प्रचार करते रहोगे।” यही कारण है कि हनुमान जी को अमर और सदा उपस्थित रहने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। देश भर में बहुत से हनुमान मंदिर है जिनमें लोग बहुत आस्था के साथ दर्शन के लिए जाते है। ऐसा ही एक मंदिर है राजस्थान के अलवर जिले के सरिस्का के जंगल में , जिन्हें पांडुपोल हनुमान मंदिर कहा जाता है।
बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास जब पांडव भोग रहे थे तब थोड़ा समय उन्होंने राजस्थान की इस अरावली पर्वत श्रृंखला पर भी व्यतीत किया था। अज्ञातवास के दौरान जब पांडव  विराटनगर जा रहे थे  तो उनके रास्ते में एक विशाल पहाड़ आ गया था तब महाबली भीम ने अपनी गदा के एक ही प्रहार से पहाड़ को तोड़कर आर-पार रास्ता बना दिया था इसी रास्ते को  ‘पोल’ (दरवाजा )  पांडुपोल कहा जाता है। साथ ही यहाँ से एक जलधारा प्रस्फुटित हुई जो आज भी झरने के रूप में वहाँ बह रही है। भीम को पर्वत में पोल बनाने का अभिमान हो गया था।
महाभारत का मूल स्वर केवल युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह मानवीय संबंधों, उनके भीतर छिपे अहंकार और उससे उत्पन्न द्वेष की गाथा भी है। रिश्तों की जटिलता और “मैं” की भावना ने ही उस युग में नकारात्मकता को जन्म दिया, जिसने अंततः महायुद्ध का रूप लिया।  ऐसे समय में भगवान कृष्ण ने यह भली-भाँति समझा कि केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि अनुभवों के माध्यम से ही अहंकार का नाश किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने हनुमान की महत्ता को पुनः प्रकट करने की लीला रची।
कहते  है कि जिस जगह  पर यह मंदिर बना हुआ है वहां पर हनुमान जी ने पांडु पुत्र भीम का घमंड तोड़ा था।  भीम एक दिन जंगल से गुजर रहे थे,रास्ते में उनका पैर एक वृद्ध वानर की पूंछ से टकराया। उन्होंने देखा कि एक वृद्ध वानर पेड़ के नीचे बैठा है और उसकी पूंछ रास्ते में फैली हुई है।अहंकार में आकर भीम ने वानर से पूंछ हटाने को कहा, और अपने भीम होने का अहंकार जताया। वानर ने स्वयं को  वृद्ध और कमजोर बताते हुए उनसे ही पूंछ हटाने का आग्रह किया। क्रोधित होकर भीम ने अपनी पूरी शक्ति लगाई, लेकिन वे पूंछ को हिला तक नहीं सके। तब उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण वानर नहीं है। सभी पांडव विनम्र होकर क्षमा माँगने  लगे और वानर ने अपना असली स्वरूप प्रकट किया वे हनुमान थे और भीम का अहंकार टूट गया। उसी झरने के तट पर हनुमानजी का मंदिर बनवाया पांडुपोल में हनुमान जी भारत का ऐसा मंदिर है जहां पर हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा विराजमान है।

सरिस्का का क्षेत्र  हरे-भरे जंगलों से होकर गुजरने वालों के लिए  मनोरम ट्रेकिंग मार्गों के लिए भी जाना जाता है। यह मंदिर एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तीर्थस्थल और एक लोकप्रिय ट्रेकिंग स्थल है, जो हर साल सैकड़ों श्रद्धालुओं, रोमांच के शौकीनों और प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करता है।

अपने आध्यात्मिक महत्व के अलावा, यह मंदिर दर्शनीय स्थलों का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ पर्यटक राजस्थान के वन्य जीवन के आकर्षण का अनुभव कर सकते हैं, स्थानीय जंगली जानवरों को देख सकते हैं और शानदार नज़ारों का आनंद ले सकते हैं। यह क्षेत्र अलवर जिले के थानागाजी तहसील के अंतर्गत आता है।  दिल्ली से 165 किलोमीटर और जयपुर से 110 किलोमीटर दूर, स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर अलवर से होकर जा सकते है। सरिस्का के गेट से मंदिर की दुरी 18 किलोमीटर है और जाने में लगभग 50 मिनिट  का समय लग जाता है। हर दिन यह मंदिर सुबह पांच बजे से शाम छ बजे तक खुला रहता है लेकिन निजी वाहन सिर्फ मंगलवार और शनिवार को यहाँ जा सकते है,  दोनों दिनों में निजी वाहनों के प्रवेश का समय सुबह 8:00 बजे से दोपहर 3:00 बजे तक निर्धारित है।  इन दोनों दिनों में अलवर जिले के नंबर वाली गाड़ियों पर कोई शुल्क नहीं लगता। दूसरी प्राइवेट गाड़ियों पर एक निर्धारित शुल्क देना होता है। इसके अलावा वहां के वाहन ले कर आप अंदर जा सकते है।

आप भगवान हनुमान के भक्त हों, इतिहास के शौकीन हों या फिर एक अनोखे यात्रा अनुभव की तलाश में हों तो ये जगह आपको बहुत आकर्षित करती है। सरिस्का (सरिस्का टाइगर रिजर्व) मुख्य रूप से अपने रॉयल बंगाल टाइगर्स के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ तेंदुए, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, लकड़बग्घे और जंगली सूअर जैसे कई जानवर पाए जाते हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए यह बेहतरीन जगह है, जहाँ 200 से अधिक प्रजातियों के पक्षी (जैसे मोर, तीतर, और कलगीदार चील) देखे जा सकते है। सरिस्का टाइगर रिजर्व प्रतिदिन दो सफारी शिफ्टों (सुबह और शाम) के लिए खुला रहता है। समय मौसम के अनुसार थोड़ा बदलता रहता है, लेकिन आमतौर पर पार्क सुबह 6:00 बजे से 10:00 बजे तक और दोपहर 2:30 बजे से शाम 6:00 बजे तक खुला रहता है । मुख्य रिजर्व बुधवार को और मानसून के मौसम (जुलाई से सितंबर) के दौरान पर्यटकों के लिए बंद रहता है।

यहाँ पहुँचने पर आप बाहरी दुनिया से दूर हो जाते हो क्योंकि ,इंटरनेट फ़ोन किसी तरह की कोई कनेक्टिविटी वहां नहीं है। यहाँ हर साल भाद्रपद (भादौ) शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन विशाल मेला भरता है, जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।  मंदिर के महंत श्री बाबू लाल  शर्मा जी बताते है कि उनकी पांचवी पीढ़ी इस मंदिर की सेवा कर रही है और आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

  • ​अंशु हर्ष

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