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“इच्छा-मृत्यु: पैसिव यूथेनिशिया” पुस्तक चर्चा में करुणा, मानवीय गरिमा और संवेदनशील समाज पर हुआ गंभीर विमर्श

9×11 कोवर्किंग, लालकोठी में लेखिका अंशु हर्ष के चर्चित हिंदी उपन्यास “इच्छा-मृत्यु: पैसिव यूथेनिशिया” का विशेष पाठन एवं चर्चा सत्र आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्य प्रेमियों, पाठकों और चिंतकों ने भाग लेते हुए उपन्यास के विविध आयामों पर विचार साझा किए तथा जीवन, मृत्यु, करुणा और मानवीय गरिमा जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श किया।
कार्यक्रम की शुरुआत नवीन गौड़ ने स्वागत उद्बोधन के साथ की। उन्होंने कहा कि पुस्तकें मनुष्य की जिज्ञासा को जीवित रखने वाली औषधि हैं। जिस प्रकार मौसम हमारी त्वचा को विभिन्न अनुभवों से परिचित कराता है, उसी प्रकार अच्छी किताबें हमारे भीतर संवेदनाओं, प्रश्नों और आत्ममंथन के नए द्वार खोलती हैं। उन्होंने कहा कि अंशु हर्ष का यह उपन्यास भी पाठकों को भावनाओं के अनेक रंगों से परिचित कराता है और उन्हें भीतर तक सोचने के लिए विवश करता है।
इस अवसर पर वक्ताओं ने लेखिका अंशु हर्ष के साहित्यिक योगदान पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के दौरान उपन्यास के चयनित अंशों का पाठन किया गया। चर्चा में बताया गया कि “इच्छा-मृत्यु: पैसिव यूथेनिशिया” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उस दर्द और अकेलेपन का दस्तावेज है जिसे समाज अक्सर देखना और समझना बंद कर देता है। उपन्यास की केंद्रीय पात्र दामिनी वर्षों से अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच ठहरी हुई है। उसका शरीर जीवित है, लेकिन उसकी दुनिया जैसे कहीं रुक गई है। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, डॉक्टर और नर्सें बदलती हैं, लेकिन दामिनी वहीं रह जाती है। धीरे-धीरे वह एक व्यक्ति से अधिक एक “केस” बन जाती है।
उपन्यास इसी बिंदु पर पाठकों के सामने एक गहरा प्रश्न रखता है क्या केवल सांस लेते रहना ही जीवन है? कहानी आगे बढ़ते हुए मानवीय गरिमा, आत्मसम्मान, संवेदना, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को बेहद संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है। इसमें अस्पताल केवल एक भवन नहीं, बल्कि पूरे समाज का प्रतीक बन जाता है, जहाँ व्यवस्था, नियम और प्रक्रियाएँ तो मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य की भावनाओं और इच्छाओं के लिए स्थान लगातार सिमटता जाता है। उपस्थित गणमान्य श्रोताओं ने कहा कि यह उपन्यास इच्छा-मृत्यु के पक्ष या विपक्ष में कोई सरल निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। यह पुस्तक पूछती है कि यदि किसी व्यक्ति की पहचान, आशा और गरिमा समाप्त हो जाए तो क्या केवल उसके शरीर को जीवित रखना पर्याप्त है?

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